Friday, September 4, 2009

बाबू जी के जीवन की तेजस्विता

डी ए वी आन्दोलन के शिखर पुरुष और आर्य समाज के देदीप्यमान नक्षत्र बाबू दरबारीलाल जी, जिन्होंने अपने जीवन के ६५ वर्षो में से ४७ वर्ष डी ए वी आन्दोलन के उस वटवृक्ष को सींचने में लगा दिए जिसे स्वामी दयानंद की स्मृति में स्थापित किया गया था जो महात्मा हंसराज के तप से सनाथ था
उसी सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण डी ए वी आंदोलन को अपनी तेजस्विता से सतत ४७ वर्षो तक सींचित करके विस्तारित करने वाले पूज्य बाबू दरबारीलाल जी के अस्सी वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में उस महामानव के प्रति नमन करने की जिम्मेदारी हर उस मानव की है जो उनके इस चुम्बकीय व्यक्तित्व और महनीय प्रभा से प्रभावित है ,जो यह समझता है कि मेरे द्वारा किए जा रहे कार्यो को या जिस कार्य को मैं कर रहा हूँ उसकी नीव उसी दिव्य प्रभा से युक्त महामानव ने रखी थी ,जो डी ए वी आन्दोलन और आर्य समाज के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए महान योगदान के प्रति कृतज्ञता से युक्त है जो उनके व्यक्तित्व में उस स्वरूप को आंकलित करने का सामर्थ्य रखता है कि हाँ बाबू जी के व्यक्तित्व में तेजस्विता का अजस्रस्रोत विद्यमान था
आओं पहले बाबू जी के व्यक्तित्व की तेजस्विता का दर्शन करले
स्वतंत्रता की खुशी से ज्यादा विभाजन की त्रासदी ने डी ए वी आन्दोलन को ज्यादा क्षति पहुचाई ,पर ईश्वर के चमत्कार अद्भुत होते है डी ए वी आन्दोलन के महानायक महात्मा हंसराज जी की मृत्यु सन १९३८ में हुई और उससे ८ वर्ष पूर्व ही बाबू दरबारी लाल जी १५.०१.१९३० में जन्म ले चुके थे ग्रामीण अंचल में पढाई की व्यवस्था तो आज भी ठीक नही है पर उस समय की स्थिति का तो हम आज भी अनुमान कर सकते है की कितनी बुरी हो होगी ,पर व्यवस्था ठीक न होने पर भी साधन के आभाव मे प्रतिभा का रास्ता आज तक भला कोई रोक पाया है पर बाबू जी तो कक्षा ४ और५ वी से ही अच्छे अंको से उत्तीर्ण होकर छात्रवृति प्राप्त करते हुए शिक्षा के प्रति अपने रुझान को व्यक्त कर चुके थे, आजादी के प्रभाव से सेना में जाने की कोशिश करना, माता पिता के मना करने पर ऐसा न करना या ईश्वर के द्वारा सामाजिक उन्नति के लिए डी ए वी आन्दोलन को सीचने के लिए सुरक्षित रखना यह तो सही रूप से ईश्वर ही जाने
पर २६ ०८ .१९४८ को वह स्वर्णिम दिन आ ही गया जब यह महामानव डी ए वी आन्दोलन की लता को, जो विभाजन की त्रासदी से मुरझा रही थी, उसे सीचने और उस बेल को विभिन्न स्थानों पर रोपने के लिए ,उस का हिस्सा बन चुका था १९४८ से लेकर १९९५तक लगातार ४७ वर्षो तक डी ऐ वी आन्दोलन और आर्य समाज की उन्नति के लिए ,न रात देखी और न दिन देखा, बस एक ही धुन थी की इस आन्दोलन को कितना शिखर तक ले जा सकता हूँ पुत्र की तरह इस संस्था का पालन किया वह तो ईश्वर की नियति को स्वीकार्य नही था अन्यथा यह आन्दोलन आज पता नहीं कितनी ऊंचाई पर होता ,

बाबू जी की उपस्थिति में डी ऐ वी परिवार की संख्या ८० से बढ़कर ६०० हो गई साथ ही आर्य प्रतिनिधि सभा के अंतर्गत आर्य समाजो की संख्या में भी अत्यधिक वृद्धि हुई पर क्या ऐसा चमत्कार ,ऐसा विलक्ष्ण कार्य एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है. संभवत नहीं ,तो निश्चित ही बाबू दरबारी लाल जी एक सामान्य नही असामान्य व्यक्ति थे तो आओं पहले बाबू जी की असामान्यता के दर्शन करले

No comments:

Post a Comment