रात और दिन सृष्टि के स्वरूप को व्यक्त करते है दिन ,जिसमे हम कर्म करते है और रात जिसमे हम विश्राम करतेहै ऐसे ही यह सृष्टि का स्वरूप है सृष्टि का जब सृजन होता है तो आत्माएं अपना शरीर धारण करके अपना कर्म करती है और जब सृष्टि का विलय हो जाता है तो आत्मा शरीर धारण करने में असमर्थ हो जाती है सृष्टि के सृजन और विलय का बहुत लंबा काल है चर्चा सृजन के काल की ही अपेक्षित है
आत्मा जब शरीर धारण करती है तो उसके साथ तीन शरीर होते है
१ कारण शरीर
२ सूक्ष्म शरीर
३ स्थूलशरीर
आत्मा इन तीन शरीरो के द्वारा ही अपना कर्म करने के लिए यहाँ आती है मोक्ष के बाद जब आत्मा सबसे प्रथम शरीर धारण करती है तो उसका कारण तो वह परमपिता परमात्मा ही जानता है या उसकी व्यवस्था हैं
लेकिन फ़िर उसके[आत्मा के ] शरीर धारण करने के जो भी कारण होते है वे उसके कर्म ही होते है और कर्म की तीन ही स्थितिया होती है
1 प्रारब्ध कर्म
२क्रियमाण कर्म
३सन्चित कर्म
हमारा यह जो जीवन चल रहा है इसका कारण हमारा प्रारब्ध कर्म अर्थात पिछले जन्म या उससे भी पिछले जन्मो मे किए कर्मो का प्रभाव और हम जो कर्म आज कर रहे है उस कर्म को क्रियमाण कर्म कहा जाता है और किए जा रहे कर्म ही हमारे संचित कर्मो का कारण बनते है
तो जो आज हम दिख रहे है उसका मूल कारण हमारा प्रारब्ध ही है एक शरीर धारी आत्मा जो महत्वपूर्ण कार्य करती है उसको करने मे उसके प्रारब्ध के शुभ कर्मो का ही योगदान है और संभवत यही चमत्कार ईश्वर का है की वह अपनी सृष्टि के सम्वर्धन के लिए आत्मा के शुभ कर्मो को एकत्रित करके एक ऐसा जीवन जीने का कारण पैदा कर देता है जिस पर अनेको लोग चलकर अपने जीवन से शुभ कर्म कर लेते है
पूज्य बाबू दरबारी लाल जी भी एक ऎसी ही पवित्र आत्मा थे जिन्होंने आपने जीवन के ६५ वर्षो मे से ४७ वर्ष उस मिशन की उन्नति और विस्तार मे लगा दिए जो महर्षि दयानंद की स्मृति में था जो महात्मा हंसराज के तप से तपा हुआ था
Thursday, August 27, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......
ReplyDeleteBahut Barhia... IBlog ki dunia me aapka swagat hai...si Tarah Likhte rahiye.
ReplyDeletehttp://hellomithilaa.blogspot.com
Mithilak Gap Maithili Me
http://mastgaane.blogspot.com
Manpasand Gaane
http://muskuraahat.blogspot.com
Aapke Bheje Photo
narayan narayan
ReplyDelete